Friday, May 25, 2012

गली-गली चोर है



मेरी मां की एक सहेली है. किसी भी मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी औरत की तरह मेरी मां की उस सहेली को भी धार्मिक कर्मकांड बहुत सुहाते हैं. उनकी बैचैन ज़िन्दगी बच्चों के दिन-रात परेशान करने, एक-एक पैसे का हिसाब रखने और पति के हर वक्त के गुस्से के बीच गुज़र रही है. ऐसे में उनके पास शांति के दो ही रास्ते हैं. एक तो औरत को साज़िशों का पिटारा बताने वाले टीवी सीरियल या फिर पूजा-पाठ को सुख का रास्ता बताने वाले मौलाना. अपने पति के दिमाग को ठंडा रखने और अपने बच्चों के परीक्षाओं में अच्छे नम्बर लाने की उम्मीद में वो मौलानाओं को झाड़-फूंक के लिए पैसे देती रहती हैं. अक्सर ही उन्हें अपने बेटे के गले में कोई नया ताबीज़ पहनाते हुए या चादर के नीचे मौलाना की दी हुई चीनी बिछाते हुए देखा जा सकता है. पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ कि उनके धार्मिक विश्वास को बहुत बड़ा झटका लगा.

तकरीबन पंद्रह दिन पहले की बात है, उनके पति ने घर पर एक मौलाना को बुलाया. शाहीन बाग़ (दिल्ली) में रहने वाले ये मौलाना इनके घर अक्सर आते रहते थे. उस दिन घर पर सिर्फ़ पति-पत्नी थे. दोपहर का वक्त था और बच्चे कहीं बाहर गए हुए थे. मौलाना ने घर में घुसते ही ऊंची आवाज़ में कहा “तुम्हारी पत्नी के ऊपर बुरा साया है, इसके अन्दर गंदगी घुस गई है जिसे बाहर निकालना होगा.” पत्नी घबरा गई और पति की तरफ़ देखने लगी. ऐसे में उस मौलाना ने पति की तरफ़ इशारा करके कहा कि तुम किचन में जाओ और थोड़ा सा आटा गूंध कर लाओ. मैं तुम्हारी पत्नी को ठीक करूंगा. उसके बाद उस मौलाना ने पत्नी को सामने एक कुर्सी पर बिठा लिया और उसके चहरे, गले और फिर सीने पर हाथ चलाने लगा. पत्नी अपने ऊपर बुरे साए की बात सुन कर पहले ही घबराई हुई थी और फिर मौलाना के इस तरह की हरकत से बिल्कुल रुंहासी हो गई. मौलाना की हिम्मत खुल गई और वो कुछ और करने के लिए आगे बढ़ने लगा, ऐसे में वो झट से खड़ी हुईं और उसे पीछे हटने के लिए कहा. तब तक उनके पति कमरे में आ चुके थे और हालात कुछ-कुछ समझ गये थे. मौलाना के जाने के बाद पति ने पत्नी से सवाल-जवाब शुरु किए जैसे उसके तुम्हारे साथ क्या किया, कहां-कहां छुआ और ये कि अगर उसने तुम्हें सीने पर हाथ लगाया है तो मैं तुम्हें तलाक़ दे दूंगा. पत्नी ने डर से अपने पति को एक लफ़्ज़ भी नहीं कहा और इतनी बड़ी बात चुपचाप सह गई. मेरी मां को ये सब बताते हुए वो बुरी तरह रो रही थीं और कह रही थीं कि मैं अब नरक में जाउंगी, मैं अपवित्र हो गई हूं.

मां को अपनी सहेली के आंसुओं में लाचारी दिखी, लेकिन मुझे उन आसुंओ में दो सवाल चमकते नज़र आए. ये कैसी व्यवस्था है जो पीड़ित को दोषी बना देती है. हमारा समाज बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामलों से इस तरह पेश आता है जिसमें अपराधी गर्व का पात्र बनता है. एक आदमी को ये गर्व से कहते सुना जा सकता है कि मैंने तो अपनी जवानी के दिनों में बहुत सी लड़कियां छेड़ीं. आज होने वाले हर अपराध को यह कह कर पल्ला झाड़ा जा सकता है कि कलयुग में पाप का वास रहेगा. लेकिन ये कोई आज की कहानी नहीं है. हमारे पुराणों में अहल्या बस्ती है. जिसके शरीर को इन्द्र ने छल से हासिल किया. इन्द्र को स्वर्ग का देवता माना जाता है, अगर स्वर्ग का शासक ऐसा है तो बेशक स्वर्ग किसी स्त्री के लिए सुरक्षित नहीं होगा. खैर, उस समय गौतम महर्षि ने अहल्या को शाप देकर पत्थर का बना दिया था. अर्थात उन्होंने अहल्या को त्याग दिया था. सतयुग और कलयुग में फ़र्क कहां है. आज भी जिस्म पर बात आए तो औरत की गलती मान कर उसे तलाक दे दिया जाता है और उस समय भी औरत को इन्सान नहीं खाने की चीज़ समझा जाता था जिसे अगर जूठा कर दिया जाए तो खा नहीं सकते.

इस घटना ने एक और सवाल उठाया है और वो ये है कि हम टीवी पर आने वाले निर्मल बाबा पर शोर मचाते हैं लेकिन गली-गली में बैठे ऐसे हज़ारों ठगों को नज़र अन्दाज़ क्यूं कर देते हैं. हमारे विवेक पर मिट्टी डालने का काम कोई एक खास बहरूपिया नहीं कर रहा बल्कि छोटे-बड़े स्तर पर आज हर मौहल्ले में ऐसे ढोंगियों ने लूट मचाई हुई है. अगर आज शाहीन बाग़ के उस मौलाना के खिलाफ़ कोई आवाज़ उठाए तो धर्म पर हमले का हावाला देकर, कई गुट खतरनाक हालात पैदा कर सकते हैं. किसी भी अच्छे या बुरे काम की शुरुआत एक छोटे क़दम से ही होती है. अगर हम एक अच्छे काम को उसके शुरुआती दौर में ना सराहें तो मुमकिन है कि वो जल्दी सांस तोड़ दे. उसी तरह अगर हम गलत क़दमों को शुरु में ही ना रोकें तो वो बढ़ते चले जाएंगे, हम पर चढ़ते चले जाएंगे. सौ-दो सौ रुपए लेकर घर में सुख-शांति का दावा करने वाले और सौ- दो सौ करोड़ का चैनल चलाने वाले, ’ऑनलाइन’ पैसा मंगाने वाले बाबाओं में ज़्यादा फ़र्क नहीं है. बस इतना कि एक गली में गुंडा-गर्दी करने वाला मवाली है और एक ए.सी में बैठकर ड्र्ग डीलींग करता डॉन.

सबसे बड़ी व्यथा ये है कि औरत कमज़ोर है इसलिए किसी गैर के छूने से तलाक़ के लायक हो जाती है. लेकिन ऐसे कपटी बाबाओं और मौलानाओं के पीछे खड़ी भीड़ के डर से हम उनपर उंगली उठाने से भी डरते हैं.

Thursday, May 24, 2012

मॉर्डन भारत का पिछड़ापन




भारतीय समाज में बलात्कार या शारिरिक उत्पीड़न के मामलों में औरत को दोषी करार देने का रवैया बहुत पुराना है. ये वही देश है जहां अहल्या को इन्द्र की वासना के कारण पत्थर बनने का शाप दिया गया. इसी समाज में बलात्कार पीड़ित फांसी की रस्सी गले में डाल कर, बेगुनाह होते हुए भी गुनहगार बन जाता है. यही वो मुल्क है जहां नाबालिग बच्ची का शोषण होने की खबर आने पर उसकी पढ़ाई-लिखाई बंद करवा दी जाती है. इसी महान देश के भरे बाज़ारों में शरीफ़ मर्द एक औरत को वैश्या कह उसके कपड़े नोचते हैं. और इसी मुल्क में माल्या परिवार के होनहार, पढ़े-लिखे, ऊंचे तबके वाले सिद्धार्थ अपनी आईपीएल टीम के एक खिलाड़ी का पक्ष लेते हुए एक स्त्री को ‘कैरक्टर सर्टीफिकेट’ देते हुए फ़ेल करते हैं.

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ‘ल्यूक पॉमर्शबैक’ आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के लिए खेलते हैं, पिछले दिनों एक अमरीकी महिला ने उनके खिलाफ़ पुलिस में शारीरिक उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाया. उस महिला के अनुसार ल्यूक पॉमर्शबैक मैच के बाद होटल के उनके कमरे तक आए जहां उन्होंने छेड़छाड़ की और साथ ही कमरे में मौजूद उनके मंगेतर के साथ मारपीट भी की. वैसे तो सही-गलत का फ़ैसला कानून करेगा लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, किसी भी बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामले में कानूनी लड़ाई से पहले ही स्त्री को दोषी करार दे दिया जाता है. सिद्धार्थ माल्या की पढ़ाई भले ही विदेशी हो, उनकी भाषा भले ही विलायती हो मगर उनके भीतर एक हिन्दुस्तानी मर्द बैठा है. उनके पिता के दुनियाभर में खरीदे हुए बहुत से बंगले ज़रूर हैं लेकिन उनके अन्दर सिर्फ़ एक ही समाज है, ये समाज वही है जो स्त्री को ‘अच्छी पत्नी’ बनने की सलाह देता है.

सिद्धार्थ माल्या ने इस घटना के बाद एक ट्वीट किया था जिसके तहत वो अमरीकी महिला अपने मंगेतर के साथ होते हुए भी उनपर डोरे डाल रही थी, उस महिला ने सिद्धार्थ से उनका ‘ब्लैकबेरी मैसेंजर पिन’ मांगा था और उसका बर्ताव एक होने वाली पत्नी जैसा नहीं था. हमारे समाज में ये माप-दंड तय हैं कि एक पत्नी का बर्ताव कैसा होना चाहिए, उसे कितने कदम चलना चाहिये, किसी पराए मर्द से कितनी बात करनी चाहिए या कितना और कैसे हंसना चाहिये. तथाकथित मॉडर्न हिंदुस्तानी समाज में ऐसी सोच का पनपना दिखाता है कि ऑक्सफ़ॉर्ड, हॉवर्ड या फिर डॉलर में पैसे लेने वाली फ़र्ज़ी विदेशी यूनिवर्सिटियों से डिग्री ले लेने से किसी की ज़हनियत नहीं खुल जाती. ना ही ‘अरमानी’ और ‘वरसाचे’ के कपड़े पहनने से कोई अपना मूल स्वभाव छुपा सकता है. स्त्री का संघर्ष अभी चल रहा है, हर तबका अपने तरीके से उसे टांग पकड़ कर नीचे खींचेगा. ये मान लेना भूल होगी कि अमीर और तथाकथित ’एलीट’ समाज में स्त्री का कोई अस्तित्व है. अगर आपके पड़ोस वाले घर की लड़की बालकनी में ज़्यादा वक्त बिताती है तो वो मौहल्ले की ‘रंभा’ बन जाती है, वहीं अगर कोई रईस तबके की लड़की अपने मंगेतर के साथ होते हुए भी किसी ‘पराए’ मर्द से ‘ब्लैकबैरी मैसेंजर पिन’ मांगती है तो वो ’वाइफ़ मटीरिअल’ नहीं कहलाती. ये दोनों ही मामले अलग-अलग समाज के ज़रूर हैं पर इनके पीछे आधार एक ही है. स्त्री का एक लगा-बंधा, पुरुषों द्वारा तय किया कैरक्टर होता है. बीवी हो तो शर्मीली हो, बहन हो तो कहना सुनती हो, मां हो तो त्याग की देवी हो. प्रेमिका अपनी है तो बाइक पर चढ़ना, पार्क में बैठना सही, दोस्त की है तो चालू कहलाएगी. अगर मान लिया जाए कि वो अमरीकी लड़की सिद्धार्थ के साथ ’फ़्लर्ट’ कर रही थी तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि वो एक अच्छी बीवी बनने लायक नहीं है. लेकिन सिद्धार्थ जिस विदेशी माहौल में पले-बढ़े हैं वहां तो ‘फ़्लर्ट’ करने, ‘ब्लाइंड डेट’ पर जाने या फिर किसी लड़की के आगे बढ़ कर फोन नंबर मांगने तक को बुरा नहीं समझा जाता. तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये उदारवादी सोच खोखली है. सिद्धार्थ के इस बयान के हिसाब से तो हर साल ‘किंगफ़िशर कैलेंडर’ में छपने वाली कोई भी लड़की शादी के लायक नहीं है.

आधुनिकता का लिहाफ़ ओढ़ने वाले एलीट समाज के भीतर छुपी दकियानूस बू वक्त-वक्त पर पिछड़े समाज तक पहुंचती रहती है. ऐसे में पिछड़ेपन के समर्थक सीना चौड़ा कर के यही कहते हैं “ऐश्वर्या राय हॉलीवुड चली गयी, फिर भी मंगलिक थी तो पेड़ के फेरे लिए ना, कुछ भी कर लो रहोगी तो लड़की ही.”  असल में हम एक बेहद ‘कनफ़्यूज़ड’ दौर से गुज़र रहे हैं, औरत की आज़ादी का राग अलापते हुए उसे लोहे की ज़ंजीरों से निकाल कर, चांदी की हथकड़ियां पहना रहे हैं. जहां अब तक संघर्ष परदे और घूंघट से था, वहीं अब मिनी स्कर्ट और बिकीनी से भी निपटना है. कमर चौबिस इन्च से ज़्यादा नहीं, गले पर ‘कॉलर बोन’ और चार इन्च की पेंसिल हील की ज़बर्दस्ती ने इसी आधुनिक समाज की स्त्री को कई लाइलाज जोड़ों की बीमारी और पीठ दर्द सौंपा है. स्त्री-विमर्श का ढोल पीटने वालों को अब सिर्फ़ चारदिवारी पर सवाल नहीं उठाने बल्कि ‘स्लट वॉक’ का समर्थन करने वालों से भी पूछना है कि क्या हंसी-ठहाके लगाते हुए टोरॉंटो की नकल कर लेना काफ़ी है. क्या कैनेडा की स्त्री की आज़ादी की लड़ाई और एक भारतीय स्त्री के स्वावलंबी होने के संघर्ष का रास्ता एक ही होगा.

हम दोहरी मार झेल रहे हैं. हमें एक सड़े-गले समाज में रहते हुए खुली हवा में सांस लेने का नाटक करना है. इन हालात में खुद को आज़ाद ख्याल साबित करने के लिए छोटे कपड़े पहनने की मजबूरी वैसी ही है, जैसे पवित्रता साबित करने के लिए साड़ी पहनना. ऐसे आधुनिक समाज से स्त्री का कोई भला नहीं होने वाला जहां शॉर्ट-टॉप तो पहना जा सकता है लेकिन लॉंग मगंलसूत्र के साथ.


Thursday, March 22, 2012

सरकारी स्कूल महान नहीं हैं…

‘नक्सली’ किसी स्कूल से नहीं गरीबी और अत्याचार से पैदा होते हैं. बेशक सरकारी स्कूल नक्सली पैदा नहीं करते मगर इतना काफ़ी नहीं है. हमें समझना होगा कि ‘क्या गलत नहीं होता इसे लेकर गर्व महसूस करना है या क्या बेहतर हो सकता है उसके लिये ज़ोर लगाना है’. अगर श्री श्री रविशंकर ने सरकारी स्कूलों के बारे में गलत बयान दिया तो इसका मतलब ये नहीं है कि हिन्दुस्तान के सारे सरकारी स्कूल महान हो गये. संस्कार ना तो सरकारी स्कूल में पढ़ने से आते हैं और ना ही प्राइवेट स्कूल में परोसे जाते हैं. संस्कार मिलते हैं घर से, किताबों से और अच्छी सोहबत से.

एक प्राइवेट स्कूल में भी गाली-गलोज, मार-पिटायी खूब होती है. हां, ये फ़र्क ज़रूर है कि गालियां अंग्रेज़ी में दी जाती हैं और लड़ाई-झगड़े सिर्फ़ बच्चों तक सीमित होते हैं. टीचरों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो बच्चों को हाथ भी लगा दें. अगर किसी टीचर ने ऐसा कर दिया तो खुद स्कूल प्रिंसिपल उस टीचर को सबक याद करवाती दिख जाती है. वहीं ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में बच्चों पर हाथ उठाया जाता है जिसे किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता. हो सकता है सरकारी स्कूलों से आई.ए.एस और आई.पी.एस निकलते हों. ऊंचे ओहदों पर बैठे ज़्यादातर लोग सरकारी स्कूलों से ही पढ़े हों पर इसका ये मतलब नहीं कि जो गलत है उसे भी सही मान लिया जाये. अक्सर ही सामने आता है कि गांव-देहात में सरकारी स्कूलों के अध्यापक खुद ही ठीक से ए,बी,सी,डी नहीं जानते और बच्चों को गलत अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं. गणित, हिन्दी और समाज-शास्त्र पढ़ाने के लिये एक ही टीचर होते हैं, और विज्ञान के नाम पर सिर्फ़ सवाल-जवाब रटाए जाते हैं. सवाल उस व्यवस्था पर उठता है जो चौदह साल तक के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने का दावा तो करती है पर असल में कई जगहों पर तो ब्लैक बोर्ड तक नहीं होता, कुर्सी-टेबल और किताबें तो दूर की बात है. कहते हैं आधी जानकारी होना, जानकारी ना होने से ज़्यादा खतरनाक होता है. हमारे ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में यही आधी जानकारी दी जाती है.

प्राइवेट स्कूल भी दूध के धुले नहीं हैं, कई महंगे प्राइवेट स्कूलों में अच्छी शिक्षा के नाम पर बच्चों को हिन्दी पढ़ाना बन्द कर दिया गया है. कई स्कूलों में हिन्दी में बात करने पर ‘फ़ाइन’ लगता है. यहां तक कि ऐसे भी प्राइवेट स्कूल हैं जो बच्चे का दाखिला लेने से पहले एक खास तरह का फ़ॉर्म भरवाते हैं, जिनमें कुछ ऐसे सवाल होते हैं कि आप हफ़्ते में कितनी बार मैक-डॉनल्ड्स जाते हैं, किस ब्रैंड के कपड़े पहनते हैं या आपके कितने रिश्तेदार बाहरी मुल्कों में रहते हैं. बेशक श्री श्री रविशंकर से जीने की कला वही लोग सीख पाते हैं जो ऐसे किसी फ़ॉर्म को कॉलर उंचा करके भर पाते हैं. ऐसे में चांद जैसी गोल आंखों और आधे चांद जैसी मुस्कान वाले रविशंकर को अपना टार्गेट देखते हुए ही बात करनी है. किसी को रिझाने का सबसे अच्छा तरीका है, उसे उंचा कहा जाये और दूसरों को गलत साबित किया जाये. रविशंकर अपनी भीड़ को खुश करने की कोशिश में निजीकरण के फ़ायदे ही गिनवायेंगे. भले ही इसके लिये गलत बयानी ही क्युं ना करनी पड़े. मगर इसका ये मतलब कतई नहीं है कि हम सरकारी स्कूलों के काले चिट्ठे भूल जायें और पूरी तरह से उन्हें आदर्श स्कूलों का दर्जा दे दें. क्लास के वक्त बच्चों का बाहर ग्राउंड में खेलना, टीचर का वक्त पर क्लास में ना आना, या स्कूल ही नहीं आना, बोर्ड परीक्षा में चीटिंग होना, टीचरों का जाति-धर्म देख कर भेदभाव करना, ये सबकुछ हमारे सरकारी स्कूलों में होता है. रविशंकर कुछ भी कहें पर हमें इस सच से मुंह नहीं मोड़ना चाहिये. कपिल सिब्बल का कहना कि मैं सरकारी स्कूल से पढ़ा हूं पर मैं नक्सलवादी नहीं हूंकाफ़ी नहीं है.

गांव-देहात और छोटे शहरों में तो कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां तबेले खुले हुए हैं, जिन्हें सिर्फ़ कमेटी हॉल की तरह शादियों के लिये इस्तेमाल किया जाता है. इन स्कूलों के टीचरों को वक्त पर तन्ख्वाह तो मिलती है, पर इलाके के बच्चे ‘क’ और ‘ख’ का फ़र्क नहीं समझते. अगर बात सिर्फ़ दिल्ली और महानगर के सरकारी स्कूल की हो तब भी इतनी लापरवाही सामनी आती है जिसमें टीचरों का बच्चों को झिड़क कर बात करना, छड़ी से मारना, कोहनी पर फुट्टे से मारना, उंगली के जोड़ों पर पेन्सिल से चोट करना, वक्त पर स्लेबस पूरा ना करना और सज़ा के तौर पर घंटों धूप में चक्कर लगवाना शामिल है.

बच्चे कांच की तरह होते हैं इन्हें बहुत ज़्यादा परवाह की ज़रूरत होती है. बिल्कुल संभाल कर रखना, बिल्कुल संभाल कर उठाना. अगर एक बार गलती से भी चटक पड़ गयी तो फिर वो कांच का हिस्सा बन जायेगी. सिर्फ़ ये सोच कर संतुष्टी कर लेना कि हम नक्सली पैदा नहीं करते काफ़ी नहीं है. एक दुतकारा हुआ, झिड़का हुआ बचपन उम्रभर की टीस देता है. एक बच्चे का मानसिक विकास और निडर होकर हंसना-खेलना, गलतियां करना उतना ही ज़रूरी है जितना वक्त पर खाना-पीना और सोना. अफ़सोस हम अपनी आने वाली पीढ़ी के खान-पान की एहमियत तो समझते हैं पर सबसे अहम उसके बचपन की कद्र नहीं कर पाते.

Sunday, February 12, 2012

हमारा देश पॉर्न ऑब्सेसिव है

कर्नाटक के भाजपा मंत्रियों ने सोचा भी नहीं होगा कि उनका पॉर्न देखना, उन्हें और उनकी पार्टी को इतना भारी पड़ जायेगा. पॉर्न देखने से आप एक गैर ज़िम्मेदार नेता नहीं बन जाते, पर हां विधान सभा के लिये लाखों वोटों से चुने गये मंत्री जी जब काम-धाम छोड़कर मोबाइल फोन के वीडिओ देखते हैं तो आफ़त तो होगी ही. वो सीट जिसके लिये उन्होंने इतने पापड़ बेले, दुनिया भर के सही-गलत काम किये, उस सीट पर बैठने के बाद अगर वो उसे टाइमपास बना दें तो भी मुसीबत तो होगी ही. पर सवाल ये है कि क्या सिर्फ़ पॉर्न देखना ही संसद या विधान सभा की मर्यादा को भंग करता है. ऐसा क्युं है कि आज तक कभी किसी मंत्री को संसद या विधान सभा में सोने के लिये जवाबदेह नहीं होना पड़ा, कभी कोई एक्शन इस बात पर क्युं नहीं लिया गया कि मंत्री सदन में हंगामा करते हैं, या फिर ये बात गैर ज़रूरी क्युं है कि मंत्री सदन की कार्यवाई में हिस्सा नहीं लेते. कई मंत्री तो ऐसे हैं जो सत्रों को प्ले ग्राउंड समझते हैं और जब मूड हो तभी आते हैं. इन मुद्दों को कभी इतनी अहमियत क्युं नहीं मिलती.

वो कांग्रेस जो आज लक्ष्मण सावड़ी, सीसी पाटील और कृष्णा पालेमार के पॉर्न देखने पर इतना हल्ला कर रही है, उनकी जान जिस तोते में है उसने पिछले आठ साल में सदन में सिर्फ़ एक बार भाषण दिया है. क्या ये मुद्दा नहीं होना चाहिये कि आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं उसकी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे. राहुल गांधी जिस अमेठी से चुन कर आते हैं उसके बारे में वहां के लोगों के बारे में उन्होंने विकास के किसी मुद्दे पर आज तक सदन में चर्चा नहीं की. जब शीला दीक्षित की सदन में आंख लग जाती है या चिदंबरम झपकी लेते हैं क्या ये बहस का मुद्दा नहीं है. हमें नींद तब आती है जब हमारा किसी बात में दिल ना लगे या जब उसमें हमारी दिलचस्पी पैदा ना हो. जैसे स्कूल में अक्सर बच्चे अपनी पसंद के विषय की क्लास में शौक से टीचर को सुनते हैं पर नापसंद विषय की क्लास में उबासी लेने लगते हैं. क्या हमारे मंत्री स्कूली बच्चे हैं जिन्हें ज़बरदस्ती कुछ सुनना पड़ता है.

हमारा देश कितना पॉर्न ऑब्सेसिव है ये तो इस बात से ही बताया जा सकता है कि रियेलिटी शो ‘बिग बॉस’ में हिस्सा लेने वाली पॉर्न स्टार सनी लियोन के शो में आते ही शो की टीआरपी बहुत तेज़ी से बढ़ी थी. अपने घरों में बहनों को खिड़की तक भी ना जाने देने वाले और घूंघट को औरत की मर्यादा मानने वाले सनी लियोन को ’स्वीट और क्यूट’ कहते पाये गये. हमारे मापदंड दोहरे हैं और हम खुद दोगले हैं. अगर बात सेक्स की हो तो हम हाय-हाय मचाते हैं पर ज़रूरी मुद्दों पर उबासी लेते हुए सो जाते हैं. पिछले दिनों भंवरी देवी कांड से एक बात तो साफ़ तौर पर पता चलती है कि भारतीय मानसिकता बिना कपड़ों वाली औरत को वैसे तो खूब गाली देती है लेकिन अकेले में उसके वीडियो डाउनलोड करके जम कर देखती है. और फिर न्यूज़ चैनलों का भंवरी देवी के वीडियो को बार-बार इस फ़्लैश के साथ चलाना कि ‘हम दिखायेंगे आपको पूरी सेक्स-सीडी’ बताता है मिडिया को भंवरी की मौत में नहीं जिस्म में दिल्चस्पी थी. किसी छोटे-बड़े शहर में जब किसी औरत के सड़क के बीचोंबीच कपड़े नोचे जाते हैं और कुर्सी पर बैठे नेता कोई कार्यवाही नहीं करते क्या तब सदन और कुर्सी की मर्यादा को चोट नहीं पहुंचती.

असल में औरत का जिस्म शोर-गुल, वाह-वाही, चीखना-चिल्लाना तो बटोर सकता है. उसके जिस्म की बनावट नज़रों को अपनी तरफ़ खींच तो सकती है. पर उसके जिस्म की चोटें किसी को नहीं दिखतीं, उसकी नंगी पीठ के घाव खाये नीले निशानों में मिडिया और दर्शकों को काम वासना दिख जाती है. सदन में बैठ कर औरत का कपड़े उतारने वाला वीडियो देखना ज़्यादा आपत्तिजनक है या औरत के बारे में ये कहना की रेप से बचने के लिये औरतें उत्तेजक कपड़े ना पहनें. भाजपा के इन तीन मंत्रियो में से एक सीसी पाटील वही हैं जिनके हाथों में राज्य का महिला और बाल विकास मंत्रालय था और इसके बाद उनका ऐसा बयान क्या उनके अपने काम के प्रति गैर ज़िम्मेदाराना रवैया नहीं दिखाता.

ये वही देश है जिसकी राजनीति इतनी गिर गयी है कि यहां विधान सभा में एक पार्टी के नेता दूसरे पर कुर्सियां-टेबल यहां तक कि चप्पलें भी बरसाते हैं. यहां विपक्ष बात-बात पर सत्र स्थगित करने की धमकी है, जिस देश में लाखों लोग भूखे सो जाते हैं और हज़ारों बीमार इलाज ना मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं. वहां सदन की कार्यवाई में सत्र के एक दिन का खर्च तकरीबन दो करोड़ होता है. ऐसे में राजनीतिक दांव-पेंच और अपनी-अपनी अकड़ के लिये सत्र की कार्यवाई भंग करना क्या अपराध नहीं होना चाहिये.

इस देश में नैतिकता और मर्यादा सिर्फ़ सेक्स और पॉर्न से जुड़े हैं. नेताओं का झूठ बोलना, घोटाले करना, गाली-गलौज करना तो माफ़ कर दिया जाता है पर अगर बात सेक्स-वीडियो देखने की हो तो मामला रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता. ये कुछ ऐसा ही है कि अगर कोई बच्चा घर से बाहर किसी से झगड़ कर उसका बैट से सर फोड़ कर आये तो मां-बाप आसानी से माफ़ कर दें पर अगर उसके कमरे से कोई अश्लील किताब मिल जाये तो घर सर पर उठा लें. ऐसे में अगर अस्मिता जैसे शब्दों का दायरा सिर्फ़ सदनों तक सीमित करने की बजाय उसे वास्तविक ज़िंदगी में भी लाया जाए तो बात बने वरना हम पॉर्न देखने वाले मंत्रियों को बर्खास्त करेंगे और बलात्कार करने वालों को विधान सभा और ससंद में सीट देते रहेंगे.

Thursday, January 26, 2012

हम धर्मनिरपेक्ष नहीं…

तो आखिरकार ना सलमान रुश्दी हिन्दुस्तान आ सके और ना ही उन्हें वीडिओ कॉन्फ़रेन्स के दौरान देखा-सुना जा सका. जीत मिली तलवार हाथ में लिये और जायमाज़ कंधे पर टांगे हुए जाहिलों को. सफ़ेद कुर्ता पहने और लाल बत्ती की गाड़ी में बठे मतलब-परस्तों को, और सिरदर्द गया खाकी वाले टेबल तोड़ते कामचोरों का. तो फिर नुकसान किसका हुआ, जब भी कोई लड़ाई, जंग या बहस होती है. तो कोई ना कोई तो हारता है, किसी ना किसी का तो नुकसान होता ही है. हां, तो घाटे में गये फिर हर बार की तरह हम, हम लोग.

सलमान रुश्दी का हिन्दुस्तान ना आना हमारी हार है. उस देश की, उस जनता की जो खुद को उदार कहती है. उस शासन पर लानत है जो एक लेखक को कुछ घंटों के लिए भी सुरक्षा नहीं दिला सकता. राजस्थान पुलिस यह कह कर अपना पल्ला झाड़ती रही कि रुश्दी की जान को खतरा है, उनके नाम की सुपारी दी गयी है. पुलिस इस लिये है कि दंबगों को काबू में करके तयशुदा कार्यक्रम चलता रहने में मदद करे या इसलिये कि गुंडों की धमकी के बारे में जानकारी देकर आपको डर कर घर बैठने के लिए कहे. जो सोचते हैं, फ़र्क नहीं पड़ता कोई रुश्दी आये या ना आये. या समझते हैं, क्या हुआ जो ‘इन्टरनेट’ के खुले मंच पर धर्म का बैनर हाथ में लिए, जनसमूह की आवाज़ को दबाने की चाल चली जा रही है. वो ये नहीं जानते, साथ खड़े शख्स का कटता गला देख कर चुप रहोगे तो तुम भी मरोगे.

अगर हिन्दुस्तान धर्मनिरपेक्ष देश है तो फिर जब यहां धार्मिक व्यक्ति को पूजा-पाठ करने, मंदिर-मस्जिद जाने, अज़ान देने, घंटी बजाने, ताज़िया या मुर्तियां निकाल कर सड़क जाम करने की अज़ादी है. तो एक नास्तिक व्यक्ति को अपने विचार रखने की आज़ादी क्युं नहीं होनी चाहिए. अगर कोई मज़हब नहीं मानता और फिर भी हर रोज़ मन्दिर की घंटियों की आवाज़ उसके कान में जाती है या सुबह-सुबह ना चाहते हुए भी उसे अज़ान सुननी पड़ती है. तब वो नहीं चिल्लाता कि मेरी भावनाएं आहत हो रही हैं, तो फिर मज़हब वाले ही क्युं इतनी छुई-मुई हैं. इस सहनशील देश में अगर किसी ने आपके धार्मिक ग्रंथ के बारे में कुछ कह दिया तो आपने दंगों की धमकी दे डाली, किसी ने आपके पूजनीय देवता की पैंटिंग बना दी तो आपने तलवारें निकाल लीं. किसी ने कहा ये मज़हब बेरहम है आपने इस मजाल पर उसकी गरदन काट ली. जैसे ही किसी ने चूं तक की आपने उसके खिलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया. और फिर फ़तवा जारी करने के बाद भी चैन नहीं. जब आप सलमान रुश्दी के खिलाफ़ फ़तवा जारी कर ही चुके हैं तो आपका उनसे कोई मतलब तो रहा नहीं वो कहीं भी आये जायें, कुछ भी कहें, कुछ भी करें. अब वो आप के मज़हब के तो रहे नहीं जो उनके कुछ ‘गलत’ कह देने से आपकी नाक कट जाएगी. फिर भी देवबंद जैसी दकियानूसी सोच वाली संस्था इस मुल्क में बड़ी शान से अपनी मनमानी करती है. अगर कोई मज़हब को नहीं मानता तो क्या उसे इस मुल्क में अपनी मर्ज़ी से जीने का, सोचने का, रहने का अधिकार नहीं है. किसी धार्मिक ग्रंथ के खिलाफ़ बोलने से या किसी मुर्ति या पैग़म्बर की कपड़ों या बिना कपड़ों की तस्वीर बना देने से हज़ारों मुक़दमे दर्ज हो जाते हैं. यहां तक कि धार्मिक संवेदनाओं को ठेस पहुंची कह कर हमारे कोर्ट फ़ैसले भी सुना देते है.

दुनिया भर में कभी किसी काफ़िर ने ऐसा कोई मुक़दमा नहीं किया कि फ़लां ग्रंथ पर प्रतिबंध लगाओ उसमें लिखा है काफ़िरों को आग में जलाया जायेगा. ना ही कभी ऐसा हुआ, किसी नास्तिक ने एफ़.आई.आर की हो कि होली में मुझ पर रंग डाला गया या दिवाली, क्रिस्मस या ईद की पार्टी के नाम पर मुझसे ऑफ़िस, कॉलेज या स्कूल में ’कम्पलसरी डोनेशन’ वसूला गया. अगर एक धार्मिक व्यक्ति अपने दिल की बात कह सकता है तो एक नास्तिक का भी शब्दों पर उतना ही अधिकार है. हमारा मुल्क किताबों पर रोक लगाने में तो महारथी हो ही चुका है. लेखकों, आर्टिस्टों को बेइज़्ज़त करने में भी हमने विदेशों में खूब नाम कमाया है, अब हममें इतनी भी सहनशीलता नहीं बची कि किसी लेखक को कम से कम सुन सकें. उस सरकार का क्या अर्थ जो अपने ‘पी.आई.ओ होल्डर’ लेखक को सुरक्षा के साथ एक आयोजन का हिस्सा न बनने दे सके. ऐसी सरकार या पुलिस पर हमें भरोसा क्युं होना चाहिए जो देवबंद नामी संस्था से डर जाए. ये सरकार कटपुतली है जो सही-गलत का फ़ैसला नहीं कर सकती. यह एक विशेष धार्मिक संस्था को इतनी शय देती है कि वो संस्था किसी के कानूनी अधिकार को छीन ले. और फिर यही सरकार धर्मनिरपेक्षता को अपनी ‘यू.एस.पी’ भी कहती है.

मुम्बई पुलिस के सूत्रों की खबर से ये बात सामने आयी है कि राजस्थान पुलिस ने सलमान रुश्दी को झूठ कह कर आने से रोका. हालांकि राज्य सरकार अपने इस दावे पर कि रुश्दी की जान को खतरा था अभी भी अड़ी हुई है. अगर ये बात सही है तब भी केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पुलिस रुश्दी को सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते. क्रिकेटरों और फ़िल्मी सितारों को आये दिन जान से मारने की धमकी मिलती रहती है. ऐसे में इन सिलेब्रिटीज़ को ’ज़ेड’ सुरक्षा उपलब्द कराने में ग़ज़ब की तेज़ी दिखाई जाती है. उन्हें स्टेडियम में जाने या शूटिंग करने से रोका नहीं जाता है.

ये वो मुल्क है जो खुद को कलात्मक समझता है, पर अपने कैनवास के हीरो हुसैन को इज़्ज़त ना दे सका. ये वो मुल्क है जो कहता है हमारा ह्रदय विशाल है लेकिन पड़ोसी मुल्क की शरणार्थी लेखिका को रहने के लिये थोड़ी ज़मीन ना दे सका. ये वही मुल्क है जहां गुरुदावारे के तहखानों में कटारें, मन्दिर के आहाते में लठबाज़ और मस्जिद के कुतबों में नफ़रत की बू मिलती है. क्या हमें इसी हिन्दुस्तान पर गर्व है. क्या हम आने वाली पुश्तों को यही मुल्क सौंपना चाहते हैं.

Sunday, November 6, 2011

इन्सान नहीं हैवान

बकरा ईद उन त्योहारों में से है जिनमें जहालत और ज़लालत की हद पार होती है. बकरों-भेड़ों को ऊंचे दामों पर खरीद के लाना अपने घर में बांधना, प्यार करना, पुचकारना और फिर कुछ रोज़ बाद ईद पर अपने आंगन में ही उसे ज़िबह (बलि) कर देना. पूरा आंगन खून से लाल, गर्दन एक तरफ़ पड़ी छटपटा रही होती है और बकरे को खींच कर ऊंचाई पर टांग दिया जाता है. जब जिस्म का सारा खून बह जाता है तब कसाई आ कर उसे ले जाता है और शाम तक उसके छोटे-छोटे खाने लायक टुकड़े कर के घर पहुंचा देता है. रात को खाने में वो जानवर जिसे दो दिन पहले तक बहुत दुलारा जा रहा था मसाले में भुन कर चटकारे ले लेकर खाया जाता है. इस्लाम में बकरा ईद के बारे में ये मान्यता है कि इन्सान को क़ुर्बानी दिये जाने वाले जानवर से जितना लगाव और जुड़ाव होगा क़ुरबानी उतना ही पुण्य दिलायेगी. ऐसा नहीं है कि क़ुर्बानी का चलन सिर्फ़ इस्लाम में है, भारत के कई हिस्सों में मनोकामना पूरी करने के लिये तांत्रिकों के सामने जानवरों यहां तक कि बच्चों की भी बलि दी जाती रही है. मगर फिर भी दोनों ही मसले पूरी तरह से अलग हैं. बकरा ईद पर जो होता है वो खुले आम सीना चौड़ा कर के बेहिसों की तरह होता है. सबसे बड़ी बात ये है कि ज़्यादातर घरों में ये सब इस कदर बेनियाज़ी से होता है कि घर के बच्चे भी जानते हैं उनका प्यारा पालतू बकरा कल खूंटी से बंधने की जगह प्लेट में आ जायेगा.

ऐसे ही बेशर्मी के त्योहारों में से एक है करवा-चौथ. कोई पति अपनी पत्नी से प्यार करता है, उसकी फ़िक्र करता है तो ये कैसे मुमकिन है कि पत्नी दिनभर कुछ खाये पिये ना और पति महोदय आराम से अपनी उम्र बढ़वाते रहें. इसी लिस्ट में छठ और तीज भी शामिल हैं जहां बेटे और भाई के लिये औरत दिन भर भूखी रहती है. ठंड के मौसम में पानी में नंगे पांव घंटों खड़ी रहती है. समाज के कई त्योहार इन्सान से इन्सानियत का लबादा उतारते रहते हैं.

इश्वर के आगे अपनी श्रद्दा साबित करने के लिये जानवर की क़ुरबानी देना ज़रूरी है. मर्द के आगे अपना प्यार साबित करने के लिये भूखा रहना ज़रूरी है. घूमफिर कर बात आती है खुद को या किसी और को तकलीफ़ देने की. ये तो साइकॉलजी भी मानती है कि जानते बूझते खुद को दर्द देना या फिर किसी को चोट पहुंचा कर खुशी मनाना दिमागी बीमारी है.

इन्सान से बड़ा वहशी जानवर कोई नहीं है, अगर आप इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते तो इन्सान के खुशियों भरे त्योहारों, मान्यताओं या फिर खेलों पर नज़र डाल लीजिये. इन्सान अपने फ़ायदे के लिए वक़्त-वक़्त पर कुदरत के तोहफ़ों को उजाड़ता रहा है. चाहे फ़र्नीचर बनाने के लिये पेड़ काटने हों या फ़ैक्ट्रियों के लिये जंगल के जंगल उजाड़ने हों.

अब हमारे खेल ही देख लीजिये कुश्ती या बॉक्सिंग. एक आदमी दूसरे को तब तक पीटेगा जब तक सामने वाला लहुलुहान ना हो जाये. एक के दांत टूटेंगे तो दूसरे की आंख फूटेगी. एक खिलाड़ी दूसरे को उठा कर ज़ोर से ज़मीन पर पटकेगा और भीड़ में जोश भर जायेगा. उस पर सफ़ाई में ये भी कहा जायेगा कि बॉक्सिंग में कैसे मारना है और कैसे नहीं इसके नियम होते हैं. इसीलिए ये खेल ग़ैर-कानूनी नहीं है बल्कि हैवानियत के मेडल भी मिलते हैं. अमरीका में यू.एफ़.सी (अल्टीमेट फ़ाइटिंग चैम्पियनशिप) की मार-काट को भी खेल ही कहा जाता है. यहां तक कि यू.एफ़.सी को खास कर ये कह कर प्रमोट किया जाता है कि इसमें को नियम नहीं. कई बड़े देशों में महंगे टिकट खरीद मां-बाप अपने बच्चों को लेकर ये वहशीपन देखने जाते हैं. इस खेल में भीड़ बस खून देखना चाहती है, शोर में बस यही सुनायी देता है “बहुत अच्छे, मारो, मारो”. एक खिलाड़ी को जब ज़ोर से मुंह पर मुक्का पड़ेगा और उसका जबड़ा टूट जायेगा तो शोर उठेगा “वाह! क्या बात है…किल हिम किल हिम”. स्पेन की बुलफ़ाइटिंग में हज़ारों लोग सांड और आदमी की भिड़ंत देखने जुटते हैं. सब लोग आदमी के ज़िंदा रहने की कामना करते हैं सांड को पहले एक तलवार से ज़ख्मी किया जाता है और फिर जंग शुरू होती है. खेल के आखिर में कोई एक मरता है, अगर आदमी मर जाये तो भीड़ को बड़ा दुख पहुंचता है. खेल को सफल तब माना जाता है जब सांड के खून से मिट्टी सन जाती है और वो मैदान में दम तोड़्ता है.

वैसे तो हम अक्सर ही अपने वहशी होने का सुबूत देते रहे हैं पर हमारे शौक़, त्योहार और मान्यताएं हमारी इन्सानियत की नौटंकी की पोल खोलती रहती है. स्वामी विवेकानंन्द के अनुसार “मज़बूत बनो क्युंकि बलि हमेशा भेड़ या बकरे की दी जाती है, शेर की नहीं” तो हम शेर तो नहीं बने क्युंकि उसके पास ज़िन्दा रहने का और कोई साधन नहीं है, वो मारेगा तभी जीएगा पर हम शौक़, स्वाद और आस्था का विश्वास दिलाने के लिये मारते हैं, भूखा रखते हैं यहां तक कि सिर्फ़ मज़े के लिये किसी को पीट-पीट कर उसका चेहरा सुजा देते हैं.

अगर आप अब भी मानते हैं कि इन्सान न्रम दिल है. तो पिछले दिनों चाइना में हुई घटना को याद कीजिये जहां दो साल की एक बच्ची को सड़क पर मरता हुआ छोड़ दिया गया था. क़रीब अठारह लोग बच्ची के पास से गुज़रे पर किसी ने भी उसे अस्पताल पहुंचाने की ज़हमत नहीं उठाई. एक-दो लोग आंख मूंद कर चलते बनें तो इत्तेफ़ाक मान सकते हैं पर इतने लोग बिना मदद किये गुज़र जायें तो सवाल खुद पर ही उठने लगता है. हमें ज़िन्दगी नहीं खून पसन्द है, हंसी नहीं चीख लुभाती है, सुकून नहीं खौफ़ सुलाता है. हम इन्सान नहीं हैवान हैं.

Monday, August 29, 2011

एक अनशन राजू का ...

भारतीय सिनेमा में हीरो वो होता है जो दस गुन्डों से अकेले लड़ जाए, जो इन्सानियत की मूरत हो और जो कभी गलत न हो. काला रंग बॉलीवुड के ’हीरो’को छू कर भी नहीं गुज़रता. वहीं अभिनेत्री आदर्श पत्नी या प्रेमिका होती है. वो बस कुरबानियां देती है वो नाचने वाली नहीं होती. अगर होती है तो उसे उस शख़्स से प्यार हो जाता है जो उसके कुंवारेपन को विदा करता है. मसलन उमराव जान या अनारकली. यहां तक कि ’नो एन्ट्री’की बिपाशा बसु जैसे किरदारों को भी किसी मजबूरी से जोड़ कर जस्टीफ़ाय किया जाता है. अगर कोई बार डांसर है तो वो बेशक ही बुरी औरत होगी जो चालाकियां करती है और बेचारी सती-सावित्री हिरोइन को सताती है.

फ़िल्म गाइड इन सभी स्टीरिओ टाइप किस्सों और हिस्सों से परे है. यहां वहीदा अपने पति को छोड़ती है, पैरों में घूंघर बांधती है पर किसी मजबूरी के तहत नहीं बल्कि अपने शौक और अपनी कला के लिए. अपने प्रेमी यानि राजू की मदद और प्रोत्साहन से खूब पैसा कमाने के बाद भी वो उसके चरणों की दासी नहीं बनती. बल्कि उलटा वो उससे ऊबने लगती है. राजू को शराब से झूलता और जूए में झूमता देख वो उसे लौटा लाने की कोशिशें नहीं करती. गाइड का राजू शरत चन्द्र का देवदास नहीं है वो अपनी अकड़ का गुलाम नहीं है ना ही उसे इस बात पर गुरूर है कि वो कभी झुकता नहीं. उसकी कमज़ोरियां उस पर हावी नहीं है. वो बहुत ही आम सा शख़्स है अपनी ज़िन्दगी में मौजूद औरत के लिए धोखाधड़ी कर सकता है,अपने यहां काम करने वाले लोगों पर गुस्से में चिल्ला सकता है यहां तक की मुसीबत में डर कर भाग सकता है. राजू की कमज़ोरियां उतनी ही आम या खास हैं जितनी किसी भी ऐसे मध्यवर्गी आदमी की होंगी जिसके पास अचानक से खूब सारा पैसा आ जाए. तो ऐसा क्या है जो देवसाहब की गाइड हिन्दी सिनेमा की क्लासिक है.

जेल, प्रेम, दुनिया और फिर स्वामी. फ़िल्म ’गाइड’ का राजू अहसासों से होता हुआ, पैसे में तैरता हुआ, ताश के पत्तों में भटकता हुआ, प्रेम की डोर को कभी थामता हुआ कभी काटता हुआ इन्सान के अनगिनत रूपों का मेल है बल्कि इन्सान के अन्दर छुपे कई इन्सानों को समेटता हुआ वो सबके जैसा होते हुए भी सबसे अलग है. रोज़ी उर्फ़ नलिनी शादी के बंधन को तोड़ते हुए, खुद की ज़िन्दगी और इच्छाओं के लिए खड़े होते हुए फिर प्रेम में गिरफ़्त होकर कमज़ोर होने वाली मगर प्रेम पर आंखें बंद कर विश्वास ना करने वाली, प्रेमी के शराब और जूए में डूबने से रोने नहीं झल्लाने वाली आम होते हुए भी बेहद खास औरत है.

सच और झूठ से चरित्र का निर्माण नहीं होता, चरित्र का निर्माण इन्सान के उठाए कदमों से होता है. इस एक बात से ही राजू किताबी और फ़िल्मी पुरुष से ऊपर उठ जाता है. वो एक शादीशुदा औरत से प्रेम करता है, उसके सो चुके ख़्वाबों को जगाता है. उससे दूर हो जाने के डर से धोखाधड़ी करता है. पकड़ा जाता है जेल पहुंचता है फिर लौट कर नहीं आता, चला जाता है एक ऐसी दुनिया में जहां लोग उसे महात्मा मानते हैं.वहां राजू मन्दिर में रहता है, गांव की तरक्क़ी के लिए काम करता है तो भोलेभाले लोग गांव में स्कूल और अस्पताल खुलने को चमत्कार समझ बैठते हैं. सूखा पड़ने पर जब मौत गांव पर अपने पंख फ़ैला देती है तो गांव वालों का अपने महात्मा पर किया अटूट विश्वास हिम्मत बंधाने लगता है. उम्मीद जब विश्वास से जुड़ती है तब आखों के सामने का सच बेमायने हो जाता है, आखें वही देखती हैं जिसकी परछाई ज़हन में तैर रही होती है. कई दफ़ा खुद का सच दूसरे के यकीन के आगे दम तोड़ देता है राजू भी अपने सच को किनारे रख चल पड़ता है उम्मीद और विश्वास के उस रास्ते पर जहां से गुज़रना उसे ढोंगी भी बना सकता था. बिलखती गिड़गिड़ाती आस्था के आगे राजू झुकता है और उस आस्था को ओढ़ बारिश के लिये उपवास रखता है.

सही-गलत, सच-झूठ, विश्वास-अंधविश्वास इन्सान के अन्दर होने वाले लड़ाईयों से शुरू होकर दुनिया में जंग का रूप लेता है. अगर मन में सवाल ही ना रहें तो जवाब के लिए ना भटकना होगा ना तड़पना होगा. हम क्यूं हैं, ज़िन्दगी का मतलब क्या है, सैंकड़ों लोगों में हमारे दर्द कितनी एहमियत रखते हैं, क्यूं दिन रात महनत करके कमाना है, क्यूं फिर उस कमाई को खुद पर ही उड़ाना है. ज़िन्दगी माना क़ीमती है पर जीना है क्या ? क्या यूंही पैदा होने, पढ़ने-लिखने, नौकरी की तलाश करने, टीवी देखने, खरीदारी करने, खूब घी-तेल खाने, जिम में जाकर वज़न घटाने, मीठे के लिए बेसब्र होने और फिर डायबटीज़ से जूझने...दिली ख्वाहिशों के पीछे भागते हुए एक दिन दिल के दौरे से ख़त्म हो जाने के लिये। ये चक्कर पूरी दुनिया को हर सांस को, हर आत्मा को दबोचे हुए है।

इसी चक्कर से मुक्त होते हुए राजू की आवाज़ बहुत तेज़ गूंजती है पर उसका शरीर इतना विशाल हो जाता है कि वो गूंज उसके अंदर ही ऊंची, धीमी,बेहद धीमी और फिर विलीन हो जाती है. राजू को मरने से पहले एक साफ़ रास्ता दिख जाता है जहां वो गर्म ठंडक और सर्द गर्मी महसूस करता हुआ. बारिश ले आता है, ज़मीन उसे समा लेती है जैसे बारिश की बूंदों को सोख लेती है.